भारत में जब भी अमूल का नाम लिया जाता है, तो दूध की क्रांति और डॉ. वर्गीज कुरियन का चेहरा सामने आता है। लेकिन क्या आप उस व्यक्ति को जानते हैं, जिसने इस ऐतिहासिक क्रांति की नींव रखी थी? वह व्यक्ति, जिसने किसानों के शोषण के खिलाफ आवाज उठाई और उन्हें अपनी मेहनत का उचित मूल्य दिलाने का सपना देखा। उनका नाम था त्रिभुवनदास किशिभाई पटेल, जिन्हें भारत के सहकारिता आंदोलन का जनक कहा जाता है।
आज जिस अमूल पर करोड़ों भारतीय भरोसा करते हैं, उसकी सफलता के पीछे इस दूरदर्शी नेता का बेहद महत्वपूर्ण योगदान रहा है। उनकी कहानी केवल एक डेयरी ब्रांड की स्थापना तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संघर्ष, त्याग, नेतृत्व और किसानों की सामूहिक शक्ति की कहानी है। Old is Gold Films की इस विशेष प्रस्तुति में जानिए उस शख्स की प्रेरक यात्रा, जिसने गांवों के किसानों को एकजुट करके भारत की श्वेत क्रांति का रास्ता तैयार किया।
आखिर कौन थे त्रिभुवनदास पटेल, जिनकी सोच ने बदल दी किसानों की दुनिया?
22 अक्टूबर 1903 को गुजरात के आणंद में जन्मे त्रिभुवनदास किशिभाई पटेल एक स्वतंत्रता सेनानी, वकील और समाजसेवी थे। उनका परिवार खेती-किसानी से जुड़ा था। इसलिए ग्रामीण जीवन की चुनौतियों को समझने के लिए उन्हें किसी विशेष अध्ययन की आवश्यकता नहीं थी। उन्होंने किसानों की परेशानियों को करीब से देखा और उनके संघर्ष को महसूस किया। यही अनुभव आगे चलकर उनके जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य बना।
उनकी शिक्षा आणंद में शुरू हुई और आगे की पढ़ाई के लिए वे गुजरात विद्यापीठ, अहमदाबाद पहुंचे। इसी दौरान महात्मा गांधी के विचारों ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया। उनके भीतर देश की आजादी और समाज में बदलाव लाने की भावना मजबूत हुई। उन्होंने समझ लिया था कि केवल राजनीतिक स्वतंत्रता पर्याप्त नहीं है। जब तक गांवों में रहने वाले किसान आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं बनेंगे, तब तक वास्तविक स्वतंत्रता का सपना अधूरा रहेगा। यही विचार आगे चलकर उनके सहकारिता आंदोलन की सबसे मजबूत नींव बना।
आजादी की लड़ाई में जेल गए, लेकिन अपने सिद्धांतों से पीछे नहीं हटे!
त्रिभुवनदास पटेल के लिए देशसेवा केवल भाषण देने या राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेने तक सीमित नहीं थी। उन्होंने महात्मा गांधी और सरदार वल्लभभाई पटेल के विचारों से प्रेरणा लेकर स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। सविनय अवज्ञा आंदोलन और नमक सत्याग्रह जैसे आंदोलनों में उनकी भागीदारी रही। इस दौरान उन्हें कई बार जेल भी जाना पड़ा।
1930 में नमक सत्याग्रह के दौरान उन्हें पहली बार गिरफ्तार किया गया। इसके बाद 1935 और 1942 के आंदोलनों में भी उन्हें जेल की यातनाएं सहनी पड़ीं। इसके बावजूद उनका संकल्प कमजोर नहीं हुआ। वे छुआछूत, शराब की लत और सामाजिक असमानता जैसी समस्याओं के खिलाफ भी काम करते रहे। हरिजन सेवक समिति से उनका लंबा जुड़ाव रहा और उन्होंने वर्षों तक इसके अध्यक्ष के रूप में सेवा की।
उनके व्यक्तित्व की खासियत यह थी कि वे स्वतंत्रता को केवल अंग्रेजों से मुक्ति नहीं मानते थे। वे चाहते थे कि समाज के कमजोर वर्गों को सम्मान और अवसर मिले। यही कारण था कि आजादी के बाद भी उनका संघर्ष जारी रहा। हालांकि, इस बार उनकी लड़ाई का मुख्य मैदान गांवों की अर्थव्यवस्था बनने वाला था।
किसानों के दूध की कीमत दूसरे तय करते थे, लेकिन त्रिभुवनदास ने यह व्यवस्था बदलने की ठानी!
1940 के दशक में गुजरात के खेड़ा जिले के दुग्ध उत्पादकों की स्थिति बेहद चुनौतीपूर्ण थी। किसान दिन-रात मेहनत करके दूध पैदा करते थे, लेकिन उसकी कीमत और बिक्री पर उनका नियंत्रण सीमित था। व्यापारियों और बिचौलियों पर निर्भरता के कारण उन्हें अपनी मेहनत का पूरा लाभ नहीं मिल पाता था। दूध जल्दी खराब होने वाला उत्पाद था, इसलिए किसान उसे लंबे समय तक रोककर भी नहीं रख सकते थे।
इसी परिस्थिति में त्रिभुवनदास पटेल ने किसानों को संगठित करने का निर्णय लिया। सरदार वल्लभभाई पटेल के मार्गदर्शन और स्थानीय किसान नेताओं के सहयोग से उन्होंने सहकारी व्यवस्था को आगे बढ़ाया। इस मॉडल का उद्देश्य स्पष्ट था। किसान स्वयं अपनी संस्था के सदस्य बनें, दूध की खरीद और बिक्री में भागीदारी रखें और आर्थिक लाभ का उचित हिस्सा प्राप्त करें।
14 दिसंबर 1946 को खेड़ा जिला सहकारी दुग्ध उत्पादक संघ की स्थापना हुई। यह संस्था आगे चलकर अमूल की ऐतिहासिक यात्रा का आधार बनी। इस विचार में सबसे बड़ी बात यह थी कि किसान किसी बाहरी व्यापारी के भरोसे रहने के बजाय अपनी सामूहिक शक्ति से बाजार में खड़े हो सकते थे। यह केवल दूध बेचने की व्यवस्था नहीं थी, बल्कि आर्थिक आत्मनिर्भरता की एक नई शुरुआत थी।
अमूल की नींव रखी गई, लेकिन क्या त्रिभुवनदास अकेले इस सपने को पूरा कर सकते थे?
किसी बड़े आंदोलन की शुरुआत करना एक बात है, लेकिन उसे सफल संस्था में बदलना बिल्कुल अलग चुनौती है। त्रिभुवनदास पटेल ने किसानों को एकजुट किया और सहकारी संघ की नींव मजबूत की। अब जरूरत थी ऐसी तकनीकी समझ और प्रबंधन क्षमता की, जो दूध के उत्पादन, प्रसंस्करण और विपणन को नए स्तर पर ले जा सके।
इसी क्रम में 1950 के आसपास उनकी मुलाकात डॉ. वर्गीज कुरियन के कार्य से जुड़ी। कुरियन ने डेयरी तकनीक, उत्पादन और विपणन की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। दूसरी ओर, एच. एम. दलाया ने दूध प्रसंस्करण और तकनीकी विकास में अहम योगदान दिया। इस प्रकार त्रिभुवनदास पटेल, वर्गीज कुरियन और एच. एम. दलाया की साझेदारी ने अमूल के विकास को नई दिशा दी।
यहां त्रिभुवनदास पटेल के नेतृत्व की असली विशेषता दिखाई देती है। उन्होंने हर काम स्वयं करने के बजाय योग्य लोगों को जिम्मेदारी सौंपी। किसानों के हितों को केंद्र में रखते हुए उन्होंने ऐसे लोगों को साथ जोड़ा, जिनकी विशेषज्ञता आंदोलन को आगे बढ़ा सकती थी। यही सहयोग आगे चलकर भारत के डेयरी उद्योग के इतिहास में एक निर्णायक अध्याय बना।
एक छोटे सहकारी संघ से राष्ट्रीय पहचान तक, कैसे बदली अमूल की तस्वीर?
आणंद में शुरू हुई सहकारी व्यवस्था धीरे-धीरे किसानों के लिए एक बड़े आर्थिक अवसर में बदलने लगी। दूध के संग्रह, प्रसंस्करण और विपणन की व्यवस्था विकसित हुई। इससे किसानों को बाजार तक पहुंचने का बेहतर माध्यम मिला। सहकारी संस्था का उद्देश्य केवल मुनाफा कमाना नहीं था, बल्कि उससे जुड़े उत्पादकों के हितों की रक्षा करना भी था।
त्रिभुवनदास पटेल के नेतृत्व में आणंद सहकारिता आंदोलन का महत्वपूर्ण केंद्र बना। इस मॉडल से प्रेरित होकर गुजरात में दुग्ध सहकारिताओं का व्यापक नेटवर्क विकसित हुआ। बाद में गुजरात कोऑपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन जैसी संस्थाओं ने अमूल के उत्पादों को बड़े बाजारों तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई।
वर्गीज कुरियन के नेतृत्व में डेयरी क्षेत्र के तकनीकी और विपणन संबंधी प्रयासों को मजबूती मिली। आगे चलकर राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड की स्थापना और श्वेत क्रांति के विस्तार ने भारत के दुग्ध उत्पादन को नई दिशा दी। इस बदलाव का प्रभाव केवल शहरों में दूध की उपलब्धता तक सीमित नहीं था। ग्रामीण परिवारों के लिए नियमित आय, महिलाओं की भागीदारी और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के अवसर भी बढ़े।
हालांकि, इस पूरी यात्रा को किसी एक व्यक्ति की उपलब्धि कहना उचित नहीं होगा। किसानों की मेहनत, सहकारी संस्थाओं का योगदान, तकनीकी विशेषज्ञता और दूरदर्शी नेतृत्व ने मिलकर इस परिवर्तन को संभव बनाया। त्रिभुवनदास पटेल का ऐतिहासिक योगदान इन सभी शक्तियों को एक मंच पर लाने में था।
जब सम्मान मिला, तो उन्होंने व्यक्तिगत संपत्ति के बजाय समाज की सेवा को चुना!
त्रिभुवनदास पटेल के योगदान को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सम्मान मिला। 1963 में उन्हें डॉ. वर्गीज कुरियन और दारा नुसरवानजी खुरोडी के साथ सामुदायिक नेतृत्व के लिए रेमन मैग्सेसे पुरस्कार प्रदान किया गया। 1964 में भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया।
लेकिन उनकी कहानी का एक महत्वपूर्ण पक्ष उनके पुरस्कारों से भी आगे जाता है। 1970 के दशक की शुरुआत में उन्होंने स्वेच्छा से अमूल की अध्यक्षता छोड़ दी। ग्रामीण सहकारी संस्थाओं के सदस्यों ने उनके योगदान के प्रति आभार व्यक्त करते हुए उन्हें लगभग छह लाख रुपये की राशि भेंट की। यह राशि व्यक्तिगत लाभ के लिए इस्तेमाल करने के बजाय उन्होंने सामाजिक सेवा की दिशा में लगाई।
इसी धन से त्रिभुवनदास फाउंडेशन की शुरुआत की गई। इस संस्था ने गुजरात के खेड़ा जिले में महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य से जुड़े कार्यों पर ध्यान केंद्रित किया। ग्रामीण क्षेत्रों में मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करना इसके प्रमुख उद्देश्यों में शामिल था। इस पहल ने दिखाया कि उनके लिए विकास का अर्थ केवल आर्थिक समृद्धि नहीं था। वे चाहते थे कि गांवों के परिवार स्वस्थ रहें और समाज की सबसे कमजोर आबादी को भी बेहतर जीवन मिले।
राजनीति में भी सक्रिय रहे, लेकिन उनकी असली पहचान किसानों के नेता की बनी!
त्रिभुवनदास पटेल का सार्वजनिक जीवन डेयरी सहकारिता तक सीमित नहीं था। वे कांग्रेस संगठन से जुड़े रहे और 1967 से 1974 के बीच दो कार्यकालों में राज्यसभा के सदस्य भी रहे। उन्होंने राजनीति को सामाजिक परिवर्तन के एक माध्यम के रूप में देखा।
हालांकि, उनकी सबसे स्थायी पहचान सहकारिता आंदोलन के नेता की रही। उन्होंने किसानों को यह विश्वास दिलाया कि संगठित होकर वे अपनी आर्थिक स्थिति बदल सकते हैं। उनके मॉडल में प्रत्येक किसान की भागीदारी महत्वपूर्ण थी। इससे गांवों के उत्पादकों को केवल कच्चा माल उपलब्ध कराने वाले लोगों के बजाय सहकारी व्यवस्था के भागीदार बनने का अवसर मिला।
आगे चलकर सहकारिता का यह विचार दुग्ध उत्पादन से आगे दूसरे क्षेत्रों के लिए भी प्रेरणा बना। त्रिभुवनदास पटेल ने साबित किया कि ग्रामीण विकास के लिए केवल सरकारी सहायता या बड़े उद्योग पर्याप्त नहीं हैं। स्थानीय लोगों का विश्वास, सामूहिक निर्णय और पारदर्शी व्यवस्था भी उतने ही आवश्यक हैं।
3 जून 1994 को दुनिया से विदा हुए, लेकिन क्या उनका सपना आज भी जीवित है?
3 जून 1994 को त्रिभुवनदास किशिभाई पटेल का निधन हो गया। उनके जीवन का अंत हुआ, लेकिन उनके द्वारा शुरू किए गए आंदोलन की यात्रा जारी रही। हजारों किसानों के जीवन में आया बदलाव उनके नेतृत्व की विरासत का महत्वपूर्ण प्रमाण बना। उनके विचारों ने सहकारिता को एक आर्थिक व्यवस्था से आगे बढ़ाकर सामाजिक सशक्तीकरण का माध्यम बनाया।
मार्च 2025 में लोकसभा ने गुजरात के आणंद में त्रिभुवन सहकारी विश्वविद्यालय स्थापित करने से संबंधित विधेयक पारित किया। इस प्रस्ताव के माध्यम से सहकारिता क्षेत्र में शिक्षा, प्रशिक्षण और शोध को बढ़ावा देने का उद्देश्य सामने आया। विश्वविद्यालय का नाम त्रिभुवनदास पटेल के सम्मान में रखा जाना उनके योगदान को याद करने का एक महत्वपूर्ण प्रयास है।
आज अमूल का नाम देश-विदेश में जाना जाता है। लेकिन इस सफलता की कहानी समझने के लिए उस व्यक्ति को याद करना जरूरी है, जिसने किसानों की सामूहिक शक्ति पर भरोसा किया था। त्रिभुवनदास पटेल की सबसे बड़ी उपलब्धि केवल एक संस्था की स्थापना नहीं थी। उन्होंने साधारण किसानों को यह एहसास कराया कि वे मिलकर अपनी तकदीर बदल सकते हैं।
उनकी कहानी भारतीय इतिहास का ऐसा अध्याय है, जिसे आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना जरूरी है। क्योंकि अमूल की असली विरासत केवल दूध के उत्पादों में नहीं, बल्कि उस विचार में छिपी है, जिसने हजारों गांवों को आत्मनिर्भर बनने का रास्ता दिखाया। त्रिभुवनदास पटेल ने जो बीज बोया था, वह आज भी सहकारिता, सामूहिक नेतृत्व और ग्रामीण विकास की प्रेरणा देता है।

